मेरी पहली गुजरात यात्रा…हिंदी में

 

हाल ही में मुझे और मेरे परिवारजनों को

गुजरात राज्य की यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

उसी सौभाग्यपूर्ण यात्रा को यहाँ

अपने पाठको के साथ साझा कर रहा हूँ ।

मेरी पहली गुजरात यात्रा…हिंदी में

 

जैसा की आप सभी को पता है कि,

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार,

पुरे भारत में दिशा के हिसाब से

चार धाम स्थित है।

जो कि,

 

उत्तर भारत में केदारनाथ धाम

दक्षिण भारत में रामेश्वरम धाम

पूर्व में जगन्नाथ पूरी धाम एवं

पश्चिम भारत में द्वारकाधीश धाम

 

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इसमें पश्चिम भारत के गुजरात राज्य में विराजमान द्वारकाधीश धाम

के नयनरम्य दर्शन करने का सौभाग्य

हालफिलहाल मुझे और मेरे परिवार जनों को मिला।

तो चलिए आइये

इस अत्यधिक धार्मिक यात्रा की शुरुआत करते है।

 

 

यात्रा का प्रारम्भ:-

 

मैं और मेरे परिवार के 17 लोग,

16 अक्टूबर 2021 के दिन दोपहर 2 बजे के करीब

Maharashtra के Nagpur Railway Station से

Howrah-Porbandar train में बैठकर यात्रा का प्रारम्भ किया।

लगभग 22 घंटो की यात्रा कर हमने गुजरात के जामनगर में उतरने का फैसला किया।

 

वहाँ से हमने एक पब्लिक बस के द्वारा

150 km का सफर करके

श्रीकृष्ण के राज्य द्वारका-धाम में प्रवेश किया।

 

 

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द्वारका:-

 

भारत के पश्चिमी तट पर स्थित

भगवान श्रीकृष्ण की शासन नगरी थी।

यह गोमती नदी के तट पर विराजमान है।

वही एक ओर समुद्र भी है।

वहाँ हम 1.5 दिन रुके

जिसदिन हम पहुंचे तब तक सूर्यास्त हो चूका था।

तो हमने मनमोहक दर्शन किये और प्रसाद ग्रहण किया। 

इसके साथ ही 17 अक्टूबर का दिन खत्म हुआ।

फिर आया 18 अक्टूबर का दिन

 

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रुक्मिणी मंदिर एवं बेटद्वारका :-

 

18 अक्टूबर की सुबह 10 बजे के करीब

हम द्वारका से कुछ ही दुरी पर स्थित रुक्मिणी मंदिर गए

वहाँ पर जाकर पता चला की एक श्राप के चलते सारे

द्वारका का पानी खारा क्यों है?

तब तक हम ये समझ रहे थे की

समुद्रतट पर बसे होने के कारण

यहाँ का पानी खारा हो।

पूरी दुनिया Radha-Krishna को पूजती है

पर रुक्मिणी कृष्णजी की रानी थी।

रुक्मिणीजी विदर्भ की राजकुमारी थी।

उन्होंने एक दिन कृष्ण को पत्र लिखा,

जिसके पश्चात अपने सखा

महारथी अर्जुन की सहायता से

श्रीकृष्ण ने रुक्मिणीजी से विवाह किया।

 

कहानी :-

 

श्रीकृष्ण के समय में बहुत

बड़े ऋषि हुए जिनका नाम दुर्वासा ऋषि था।

एक बार श्रीकृष्ण एवं उनकी पत्नी रुक्मिणी

उन्हें स्वरुचि भोज पर आमंत्रित करते है।

पर उनकी शर्त थी की

उन्हें जानवरों से खींचे जाने वाले रथ में ना बिठाया जाएं

तो एक तरफ से श्रीकृष्ण और दूसरी तरफ रुक्मिणीजी रथ को खींचने लगे

इतने में रुक्मिणीजी को प्यास लगी

तो कृष्णजी ने अपने पैर का अंगूठा

जमीन में दबाकर वहाँ से पानी प्रकट कर दिया

जिससे दोनों ने अपनी प्यास बुझाई

पर ऋषि दुर्वासा को पूछना भूल गए

जिससे नाराज़ होकर दुर्वासा ऋषि ने श्राप दिया

उस दिन से ही पूरी द्वारका का पानी खारा है

ऐसी मान्यता है।

 

बेट-द्वारका जो की श्रीकृष्ण का निवास-स्थान था

मान लीजिये जिस प्रकार द्वारका उनका ऑफिस है।

तो बेट-द्वारका उनका रेजिडेंशियल है। 

बेट-द्वारका उसे इसीलिए कहा जाता है

क्योकि वह समुद्र के बीच एक island पर स्थित है।

फ़िलहाल वहाँ बोट पर सवार होकर जाना पड़ता है।

पर आने वाले कुछ ही सालों में

वहाँ तक के पूल का निर्माण कार्य पूर्ण हो जायेगा।

 

 

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वहाँ पर गर्भगृह में द्वारकाधीश मतलब की

श्रीकृष्ण की दर्शनीय मूर्ति स्थापित है।

 

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग :-

 

वहाँ से वापसी की यात्रा के दौरान

हम पहुंचे नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में।

 

 

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इत्तेफ़ाक़ की बात है की उस दिन सोमवार भी था।

यह भारत के महत्वपूर्ण 12 ज्योतिर्लिंग में समाविष्ट है।

इस मंदिर की खासियत है की इसका निर्माण

T-series के संस्थापक एवं

महादेव के परमभक्त Gulshan-Kumar किया गया है।

इस मंदिर का आकर्षण है

मंदिर परिसर में बनी हुई

महादेवजी की विशालकाय मूर्ति।

 

 

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वहाँ से हम वापस द्वारकाधीश की नगरी में आ गए।

मंदिर से कुछ क़दमों की दुरी पर स्थित है

सुदामा – सेतु

Sudama-setu

आपको तीर्थस्थलों के तटों की याद दिलाएगा।

 

 

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बहुत ही सुन्दर दृश्य

बहुत ही शांत वातावरण

कोई कोलाहल नहीं,

कोई रोजमर्रा की चिड़चिड़ाहट नहीं

वक़्त मानो थम सा गया हो

बहुत से दृश्य मैं शब्दों में तक

बयां नहीं कर सकता।

थोड़ा और अँधेरा होने पर

द्वारकाधीश मंदिर के लाइटों की जगमगाहट

का समुद्र के पानी में reflection और भी

जैसे मानो

Cherry on the cake

matlab

सोने पे सुहागा

जैसा था।

उस पल को जीने के बाद

सभी की पुनः मंदिर में जाकर दर्शन करने की इच्छा हुई

और हम पुनः दर्शन करने की लालसा में

मंदिर में प्रवेश किये और साथ ही

द्वारकाधीश की आरती का भी आनंद लिया।

इसी तरह से 18 अक्टूबर का दिन खत्म हुआ।

 

 

सोमनाथ की ओर :-

 

19 अक्टूबर की सुबह

हम करीब 8 बजे द्वारधीश के दर्शन कर

सोमनाथ की ओर प्रस्थान किए।

रास्ते में हमने

माता हरसिद्धि मंदिर के दर्शन किए

 

माता हरसिद्धि :-

 

माता हरसिद्धि एक शक्तिपीठ है।

बहुत लोगों की इनमे श्रद्धा है।

इनके बारे में मान्यता है की ये

सुबह के समय में वे गुजरात में

और संध्या के समय

महाकाल की नगरी उज्जैन में वास करती है।

ये भगवान श्रीकृष्ण की कुलदेवी मानी जाती है।

यह मंदिर द्वारका से पोरबंदर के रास्ते में स्थित है।

यह भी कहा जाता है की

यहाँ लोगों की अधूरी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती है।

यहाँ से प्रसाद ग्रहण कर हम भालका तीर्थ की ओर चले

 

भालका तीर्थ:-

श्रीकृष्ण के मोक्ष प्राप्ति का तीर्थ है

भालका तीर्थ।

ऐसा कहा जाता है की

जरा नामक एक शिकारी ने

भगवान के पैर में बाण मारा

जिसकी वजह से भगवान

मनुष्य शरीर को त्याग कर देवलोक सिधार गए

और उसके साथ ही

द्वापर-युग का अंत हो गया।

यहाँ से आगे बढ़कर हम श्री सोमनाथ पहुंचे।

और 19 का आधा दिन बित गया।

 

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग:-

 

सोमनाथ पहुंचकर हमने

उसी दिन दर्शन करने का तय किया।

12 ज्योतिर्लिंगों में श्री सोमनाथ प्रथम वंदनीय है।

संध्या में हम सब सोमनाथ मंदिर परिसर पहुँच गए।

क्योंकि ज्यादा भीड़ नहीं थी

हमने आराम से दर्शन किए।

दर्शन पश्चात मंदिर के पीछे परिसर में

भव्य आउटडोर ऑडिटोरियम जैसा बना है जहा

रोज संध्या 7 बजे के करीब

एक लाइट एंड साउंड शो होता है।

इस शो की खासियत है की यह

सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन के स्वरों में होता है।

इसमें कैसे सोमनाथ मंदिर पर अनेकों बार बाहरी आक्रमण हुआ।

इसके बावजूद सोमनाथ का वह भव्य मंदिर धर्म रक्षा का प्रतीक है।

 

मध्यप्रदेश की महारानी

पुण्य श्लोका अहिल्याबाई होळकर द्वारा

बगल में ही सोमनाथ मंदिर बनाया गया था।

जिसके दर्शन हमने अगले दिन किए।

 

इसीके साथ 19 तारीख का दिन भी खत्म हुआ।

 

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग एवं पोरबंदर :-

20 अक्टूबर के दिन

हम पुनः सोमनाथजी के दर्शन कर

करीब 12 बजे हम पोरबंदर के लिए प्रस्थान किए।

पोरबंदर पहुंचकर हमने

कीर्ति मंदिर यानी की

महात्मा गांधीजी का जन्म-स्थान देखा

एवं पास ही में सुदामापूरी भी गए।

सुदामापुरी में दूध- पोहे का प्रसाद ग्रहण किए।

तत्पश्चात हम करीब रात के 8.30 बजे

सौराष्ट्र एक्सप्रेस के माध्यम से

पोरबंदर से अमदावाद की यात्रा शुरू की

अगले दिन सुबह 7.30 के करीब हम अमदावाद पहुंचे।

 

गांधीनगर :-

gandhinagar hindi mein

 

अमदावाद से 30 किमी पर स्थित

गुजरात राज्य की राजधानी

गांधीनगर में हमारे रुकने का प्रबंध था।

21 अक्टूबर की सुबह करीब 11 बजे

 

पावागढ़ :-

 

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हम गांधीनगर से करीब 150 किमी दूर स्थित

कालीमाता के पावागढ़ पहुंचे

जी हां मैं वही पावागढ़ की बात कर रहा हूँ।

नवरात्री के समय गरबा करते वक़्त जो आप गाना सुनते है

ये वही पावागढ़ है।

वहाँ पहुँचते हमे शाम के करीब 5 बज गए।

वहाँ से बहुत ऊंचाई पर उड़नखटोला

(rope-way) की मदद से हम मंदिर से

करीब 300 सीढिया नीचे थे।

फिर सीढिया चढ़कर दर्शन करते हुए हमे रात के 7.30 बज गए।

मंदिर में निर्माणकार्य जोरों पर था।

लेकिन श्रद्धालुओं का उत्साह देखने लायक था।

इसके बाद हम वापस गांधीनगर आ गए।

और ठीक यूँ ही 21 अक्टूबर का दिन बीत गया।

 

Statue of  Unity :-

 

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few lines on statue of unity in Hindi

statue of unity gujarat in hindi

 

हमने 22 अक्टूबर की स्टेचू ऑफ़ यूनिटी की टिकिटें

बुक कर रखी थी। यह भी गांधीनगर से करीब 180 किमी दूर है।

यह हमारे देश के लौह पुरुष

सरदार वल्लभभाई पटेल

जिनकी हालही में जन्म-जयंती हुई

उनका स्मारक है।

SOU विश्व की सबसे ऊँची स्मारक है।

करीब 183 मीटर ऊँचा है।

ये अन्य देशों में स्थित अद्भुत स्मारकों से भी ऊँचा है।

गुजरात के kevadia में स्थित है।

135m पर इनके हृदय में viewing-gallery

वहाँ से सरदार-सरोवर का नज़ारा है।

एवं front-view और back-view देख सकते है।

इसके ऊपर सिर्फ मेंटेनेंस वालो एवं

staff को ही परमिशन है।

नीचे ground-floor एक तरह की प्रदर्शनी है

वहाँ उनका जीवन-काल चित्र एवं चल-चित्र के द्वारा

सादर किया गया है।

SOU में बहुत ही सुन्दर

valleyofflowers एवं

सरदार सरोवर डैम भी था।

पर अफ़सोस समय के अभाव में हम देख नहीं पाएं।

 

BOOK TICKETS HERE

वहाँ से वापस गांधीनगर आए।

इसीके साथ 22 अक्टूबर का दिन भी समाप्त हुआ।

 

 

माहुड़ी जैन मंदिर :-

 

mahudi jain mandir

mahudi jain tirth

ghantakarna mahavir

 

23 अक्टूबर को गांधीनगर से समीप

प्रसिद्ध माहुड़ी जैन मंदिर के दर्शन किए

तीन मंदिरो का समावेश है।

घंटाकर्ण महावीर एवं

पद्मनाभप्राभु महावीर जी का मंदिर स्थित है।

इस मंदिर की खासियत है यहाँ का प्रसाद

प्रसाद खाकर पानी पीकर ही

आप दूसरे मंदिर में दर्शन करने जा सकते है।

इस प्रसाद को वही खाना होता है।

आप पुजारी से मिले प्रसाद को

परिसर से बाहर नहीं खा सकते है।

यहाँ 24 जैन तीर्थंकरो के भी दर्शन होते है।

 

हनुमान मंदिर :-

 

तत्पश्चात हम डाभोड़िया हनुमान मंदिर गए ।

यह गांधीनगर से लगभग 15 किमी पर स्थित है।

यहाँ विराजमान हनुमानजी की मूर्ति की खासियत है

इसका स्वयंभू होना।

ऐसा कहा जाता है की

लगभग 1000 साल पहले

यह मूर्ति जमीन से स्वयं प्रकट हुई थी।

 

साबरमती आश्रम :-

वहाँ से चलके हम अपनी यात्रा संपन्न

करने के लिए अमदावाद में साबरमती आश्रम घूमे।

साबरमती आश्रम में बापू की उपयोग की हुई वस्तुओं का

एक तरह से संग्रहालय है।

वहाँ उनके चित्र एवं चल-चित्र द्वारा जीवन का

सन्देश दिया गया है।

वहाँ की खासियत है की

कोई भी पर्यटक एक निशुल्क डिजिटल गाइड ले सकता है।

उसमें audiobook की तरह लगभग 9 मिनिटो में पुरे आश्रम का टूर करा देगा।

सिर्फ वहाँ के Wi-Fi कनेक्शन से कनेक्ट हो कर।

 

यात्रा का समापन :-

इसके बाद हम सीधा अमदावाद के रेल्वे स्टेशन पहुंचे

जहाँ ठीक शाम 7 बजे हमारी वापसी की ट्रैन

ADI-PURI एक्सप्रेस हमारा इंतज़ार कर रही थी।

इसीके साथ हमारी एक धार्मिक यात्रा का कुशलमंगल समापन हुआ ।

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